समाज में शांति, सुरक्षा और प्रगति के लिए ‘सामाजिक न्याय’ की नींव का मजबूत होना अनिवार्य है। हर साल 20 फरवरी को दुनिया भर में विश्व सामाजिक न्याय दिवस (World Social Justice Day) मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि एक सभ्य समाज वही है जहाँ हर व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के समान अवसर और अधिकार प्राप्त हों। World Social Justice Day 2026 का यह अवसर हमे और शासन- प्रशासन को सामाजिक न्याय के प्रति जागरूक करने और सामाजिक न्याय से संबंधित क्षेत्रों मे और अधिक सजगता से कार्य करने की प्रेरणा देता है।
भारत जैसे विविधता वाले देश मे सामाजिक न्याय का महत्त्व और अधिक हो जाता है। यहाँ विभिन्न जातियों, धर्मों के लोग एक साथ रहते हैं, विभिन्न आर्थिक स्तर के लोग भी साथ रहते हैं। इसलिए यहाँ सामाजिक न्याय की आवश्यकता अधिक है और इसलिए भारतीय संविधान मे इसके लिए विशेष प्रावधान किए गयें हैं। भारतीय संविधान के जनक डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने जीवन भर सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष किया था। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक बेमानी है जब तक समाज में सामाजिक और आर्थिक समानता न हो।
ज्ञान दुनिया पर इस लेख मे हम जानेंगे सामाजिक न्याय क्या है और भारतीय संविधान मे सामाजिक न्याय के क्या प्रावधान किए गए हैं?
World Social Justice Day 2026- सामाजिक न्याय क्या है ?
सामाजिक न्याय का अर्थ केवल कानून की नजर में समानता नहीं है, बल्कि इसका व्यापक अर्थ समाज के सभी वर्गों—विशेषकर पिछड़े, वंचित और कमजोर वर्गों—को विकास की मुख्यधारा में लाना है। इसका उद्देश्य जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान या रंग के आधार पर होने वाले हर तरह के भेदभाव को समाप्त करना है। इसका उद्देश्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहाँ हर व्यक्ति को अपनी क्षमता विकसित करने के लिए समान अवसर मिलें।सामाजिक न्याय एक ऐसी अवधारणा है जो समाज में सभी व्यक्तियों के लिए समानता, निष्पक्षता और मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।
भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय के विशेष प्रावधान
भारत का संविधान दुनिया के उन चुनिंदा संविधानों में से है जहाँ सामाजिक न्याय को ‘प्रस्तावना’ (Preamble) में ही सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर और संविधान सभा के अन्य सदस्यों ने ऐसे प्रावधान किए जो सदियों से चली आ रही असमानता को जड़ से मिटा सकें। भारतीय संविधान का मूल उद्देश्य केवल शासन चलाना नहीं, बल्कि एक समतामूलक समाज स्थापित करना है — जहाँ हर नागरिक को समान अवसर, गरिमा और सुरक्षा मिले।
1. संविधान की प्रस्तावना (Preamble)
संविधान की शुरुआत में ही तीन प्रकार के न्याय की बात की गई है: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय। अर्थात राज्य का कर्तव्य है कि समाज में ऊँच-नीच समाप्त हो, शोषण खत्म हो, अवसरों की समानता मिले। यही सामाजिक न्याय का मूल दर्शन है। यह स्पष्ट करता है कि भारत एक ‘लोकल्याणकारी राज्य’ (Welfare State) होगा।
2. मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)
संविधान के भाग-3 में कुछ ऐसे अनुच्छेद हैं जो सीधे सामाजिक न्याय सुनिश्चित करते हैं:
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अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता।
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अनुच्छेद 15: धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध।
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अनुच्छेद 16: लोक नियोजन (Government Jobs) में अवसर की समानता, पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण मान्य।
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अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता (Untouchability) का अंत – यह सामाजिक न्याय की दिशा में सबसे क्रांतिकारी कदम था।
- अनुच्छेद 18: “राजा”, “जमींदार” जैसी सामाजिक श्रेष्ठता खत्म
- अनुच्छेद 19–22: स्वतंत्रता का अधिकार- कमजोर वर्गों को भी स्वतंत्र रूप से, बोलने, रहने, काम करने का अधिकार
- अनुच्छेद 23-24: शोषण के विरुद्ध अधिकार– ये सामाजिक न्याय का अत्यंत महत्त्वपूर्ण भाग है। इसमे अनुच्छेद 23- बंधुआ मजदूरी निषिद्ध और मानव तस्करी अपराध से जुड़ा है जबकि अनुच्छेद 24- 14 वर्ष से कम बच्चों से खतरनाक काम करने को निषिद्ध करने से जुड़ा है।
3. राज्य के नीति निर्देशक तत्व (DPSP)
संविधान का भाग-4 सरकारों को निर्देश देता है कि वे नीतियाँ बनाते समय सामाजिक न्याय का ध्यान रखें:
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अनुच्छेद 38: राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाएगा जिससे जन-कल्याण को बढ़ावा मिले।
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अनुच्छेद 39A: सभी को समान न्याय और गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता सुनिश्चित करना।
- अनुच्छेद 41: काम मे सहायता और अधिकार- बेरोजगारी में सहायता, वृद्धावस्था पेंशन, विकलांग सहायता
- अनुच्छेद 42: श्रमिक कल्याण- बेरोजगारी में सहायता, वृद्धावस्था पेंशन, विकलांग सहायता
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अनुच्छेद 43: जीवनयापन योग्य वेतन- मजदूरों को सम्मानजनक वेतन
- अनुच्छेद 45: सभी 14 वर्ष से काम उम्र के बालकों को प्रारम्भिक शिक्षा देना अनिवार्य है।
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अनुच्छेद 46: अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना।
इसके अलावा अन्य संस्थाएं भी हैं जो अपने स्तर पर समाज मे सामाजिक न्याय की अवधारणा का पालन करती हैं जैसे- राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, महिला आयोग, बाल अधिकार आयोग। ये संस्थाएँ सामाजिक न्याय लागू करवाती हैं।
