सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए नियम पर क्यों लगाई रोक– सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा बनाए गए नए नियमों पर रोक लगा दी है। ये नियम 14 जनवरी 2026 को लागू किए गए थे और यूजीसी के अनुसार इनका मकसद उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकना बताया गया था। लेकिन नियम लागू होते ही देशभर में इस पर सवाल उठने लगे थे। छात्रों, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों ने इसे लेकर चिंता जताई, जिसके बाद मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में ये भी कहा कि जब तक नए नियमों की पूरी तरह समीक्षा नहीं हो जाती और नया कोई आदेश नहीं आ जाता, तब तक UGC के 2012 के नियम ही लागू रहेंगे।
UGC के नए नियम क्या थे?
UGC ने “Promotion of Equity in Higher Educational Institutions Regulations, 2026” नाम से नए नियम जारी किए थे। इन नियमों को रोहित वेमुला और पायल तन्वी केस को मद्देनजर रखते हुए लाया गया था। इन नियमों के तहत कॉलेज और विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के लिए नए प्रावधान लाए गए। हालांकि जाति आधारित भेदभाव को रोकने के लिए लाए गए प्रावधानों के शब्दों पर ही विवाद हो गया।
इस नियम की मुख्य बातें इस प्रकार थीं:
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अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों और कर्मचारियों के लिए विशेष सुरक्षा प्रावधान(इसमे जनरल केटेगरी को शामिल न करने पर ही विवाद हुआ)
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भेदभाव से जुड़ी शिकायतों के लिए नई शिकायत निवारण समितियाँ- समान अवसर केंद्र, समता समिति, समता समूह
समान अवसर केंद्र– प्रत्येक संस्थान को वंचित समूहों के लिए नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन की निगरानी के लिए समान अवसर केंद्र स्थापित करने होंगे। इसमें संस्थान के पांच फैकल्टी सदस्य होंगे। इन पांच सदस्यों के लिए किसी भी कैटेगरी के लिए कोई आरक्षण नहीं है।
समता समिति– समान अवसर केंद्र को एक समता समिति बनानी होगी। इसके अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख होंगे। इसमें एससी, एसटी, ओबीसी, विकलांगों और महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी अनिवार्य होगा। इस समिति में कुल दस सदस्य होंगे।
समता समूह– प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान निगरानी रखने तथा परिसर में किसी भी भेदभाव को रोकने के लिए एक छोटी इकाई भी गठित करेगा, जिसे ‘समता समूह (इक्विटी स्क्वॉड)’ कहा जाएगा। उच्च शिक्षण संस्थान आवश्यक संख्या में समता समूह गठित कर सकता है, और ऐसे समूह गतिशील रहेंगे तथा संवेदनशील स्थानों पर नियमित रूप से निरीक्षण करेंगे।
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संस्थानों पर सख्त जिम्मेदारी कि वे भेदभाव के मामलों में तुरंत कार्रवाई करें
UGC का कहना था कि ये नियम समानता और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देंगे। लेकिन यहीं से विवाद शुरू हुआ। क्योंकि यूजीसी ने समानता और सामाजिक न्याय की परिभाषा को जनरल/सवर्ण बनाम अन्य केटेगरी मे बाँट दिया। नियमों मे सुधार और कॉलेजों मे समानता लाने के नाम पर नए नियमों के आधार पर कॉलेज के वातावरण को जातिभेद के जहर से भर दिया।
नए नियमों पर विवाद क्यों हुआ?
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि ये नियम अस्पष्ट और एकतरफा हैं। उनका कहना था कि नियमों में केवल कुछ वर्गों (ओबीसी, एससी /एसटी ) को ही स्पष्ट सुरक्षा दी गई है, जबकि सामान्य वर्ग (General Category) को बाहर रखा गया है। एक प्रकार से ये नियम कॉलेज को सामान्य/सवर्ण बनाम अन्य वर्ग मे बाँटने वाला था।
नए नियमों का सबसे विवादित हिस्सा है नियम 3(C). इसमें पहली बार “जाति आधारित भेदभाव” की साफ परिभाषा दी गई. नियम 3(C) के मुताबिक, जाति आधारित भेदभाव का मतलब है – अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के सदस्यों के साथ केवल उनकी जाति या जनजाति के आधार पर किया गया भेदभाव.
यानी इस नियम में यह साफ तौर पर कहा गया कि अगर इन तीन वर्गों के छात्रों या कर्मचारियों के साथ जाति के कारण भेदभाव होता है, तो उसे गंभीर माना जाएगा और उस पर कार्रवाई होगी.
इससे सवर्ण समाज और शिक्षकों द्वारा यह आशंका जताई गई कि इन नियमों का गलत इस्तेमाल हो सकता है।बिना ठोस जांच के किसी पर भी आरोप लगाए जा सकते हैं। क्योंकि इन नियमों इससे विश्वविद्यालयों में डर और तनाव का माहौल बनेगा। सवर्ण समाज का कहना है कि इन नियमों मे केवल सामान्य वर्ग को ही सुरक्षा नहीं दी गई है, इसलिए इन नियमों का उनके विरुद्ध दुर्भावनावश गलत इस्तेमाल हो सकता है।
कुछ लोगों ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14- समानता का अधिकार के खिलाफ भी बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए नियम पर क्यों लगाई रोक?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान यूजीसी के नए नियमों पर कई अहम सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि भेदभाव खत्म करना ज़रूरी है, लेकिन इसके लिए बनाए गए नियम स्पष्ट, संतुलित और सभी के लिए समान होने चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि नियमों की भाषा बहुत सामान्य और अस्पष्ट है। अगर नियम साफ़ नहीं होंगे तो उनका दुरुपयोग हो सकता है। भेदभाव रोकने के नाम पर ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाना चाहिए जिससे समाज और ज्यादा बँट जाए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत ने बीते 75 सालों में समाज को जोड़ने की दिशा में काफी प्रगति की है। कॉलेज और विश्वविद्यालय ऐसे स्थान हैं, जहां अलग-अलग पृष्ठभूमि के युवा साथ रहते हैं, पढ़ते हैं और आगे बढ़ते हैं। अगर कैंपस में जाति के आधार पर नई रेखाएं खींची जाएंगी, तो यह समाज के लिए ठीक नहीं होगा।
कोर्ट ने यह भी पूछा कि जब 2012 से भेदभाव रोकने के नियम पहले से मौजूद हैं, तो नए नियम लाने की क्या ज़रूरत थी, और अगर लाए गए तो उन्हें और बेहतर क्यों नहीं बनाया गया।
यूजीसी ऐक्ट 2012 क्लॉज़ 3(E)- यह नियम कहीं ज्यादा व्यापक था. इसमें कहा गया था कि किसी भी छात्र या कर्मचारी के साथ जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, लिंग, जन्म स्थान, शारीरिक स्थिति या किसी भी अन्य आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। यानी नियम 3(E) सभी वर्गों के लिए समान सुरक्षा देता था। इसमें यह नहीं देखा जाता था कि छात्र किस जाति या वर्ग से आता है। अगर किसी के साथ गलत व्यवहार हुआ है, तो वह शिकायत कर सकता था।
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